शिव बरात में सब अद्भुत था


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शिव बरात में सब अद्भुत था
बापू बोले, भगवान राम के प्राकट्य के क्षण खुशहाली थी
अमर उजाला ब्यूरो
कसया। रामकथा में शुक्रवार को सातवें दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने भगवान शिव- पार्वती विवाह और प्रभु श्रीराम के प्राकट्य की कथा सुनाई। कथा व्यास ने कहा कि जब भी धरती पर भगवान की जरूरत होती है तो वे यहां जरूर आते हैं।
शिव-पार्वती विवाह की कथा सुनाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि शंकर जी की बरात में दुनिया के सभी विलक्षण जीव थे। देवता से लेकर भूत-पिशाच तक इस बरात में शामिल हुए। बरात जब हिमांचल राज के यहां पहुंची तो माता मैना देवी भगवान शिव की आरती करते वक्त बेहोश हो गईं। विद्वानों का कहना है कि मैना देवी को लगा कि जिसने सिर पर चंद्रमा धारण किया हो उसकी आरती एक छोटे दीपक से कैसे हो सकती है। इसी प्रकार जिसकी जटाओं से गंगा जी निकली हों उसकी पूजा एक लोटा जल से कैसे हो सकता है। बरात का यथोचित स्वागत के बाद वैदिक रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराया गया। कैलाश पहुंचकर देवी पार्वती ने भगवान शिव से रामकथा सुनाने का आग्रह किया। भगवान शिव ने रामकथा सुनाते हुए कहा कि धरती पर जब रावण का अत्याचार बढ़ गया तो पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की। ऋषि-मुनियों ने भी ब्रह्मा जी की आरती की। सभी ने अपनी-अपनी जगह पर खड़े होकर भगवान विष्णु की आराधना की। भगवान विष्णु ने सभी को प्रतीक्षा करने का कहा। कथा के अगले चरण में अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र की कामना लिए गुरु वशिष्ठ से भविष्य की बात बताने की याचना की। इस पर वशिष्ठ ने पुत्रेष्टि यज्ञ का सुझाव दिया। शृंगी ऋषि ने यज्ञ को पूर्ण कराया। यज्ञ देवता प्रकट हुए और गुरु वशिष्ठ को खीर प्रदान की। खीर का आधा हिस्सा रानी कौशिल्या ने ग्रहण किया। शेष का एक चौथाई हिस्सा रानी कैकेई को दिया गया। शेष एक चौथाई हिस्से को दो भाग में बांटकर कौशिल्या व कैकेयी ने सुमित्रा को दिया। नियम समय पर अयोध्या में भगवान राम प्रकट हुए। उस वक्त धरती पर खुशहाली छा गई। देवताओं ने आकाश मार्ग से पुष्पवर्षा की।

शिव बरात में सब अद्भुत था विज्ञापन

बापू बोले, भगवान राम के प्राकट्य के क्षण खुशहाली थी
अमर उजाला ब्यूरो
कसया। रामकथा में शुक्रवार को सातवें दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने भगवान शिव- पार्वती विवाह और प्रभु श्रीराम के प्राकट्य की कथा सुनाई। कथा व्यास ने कहा कि जब भी धरती पर भगवान की जरूरत होती है तो वे यहां जरूर आते हैं।
शिव-पार्वती विवाह की कथा सुनाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि शंकर जी की बरात में दुनिया के सभी विलक्षण जीव थे। देवता से लेकर भूत-पिशाच तक इस बरात में शामिल हुए। बरात जब हिमांचल राज के यहां पहुंची तो माता मैना देवी भगवान शिव की आरती करते वक्त बेहोश हो गईं। विद्वानों का कहना है कि मैना देवी को लगा कि जिसने सिर पर चंद्रमा धारण किया हो उसकी आरती एक छोटे दीपक से कैसे हो सकती है। इसी प्रकार जिसकी जटाओं से गंगा जी निकली हों उसकी पूजा एक लोटा जल से कैसे हो सकता है। बरात का यथोचित स्वागत के बाद वैदिक रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराया गया। कैलाश पहुंचकर देवी पार्वती ने भगवान शिव से रामकथा सुनाने का आग्रह किया। भगवान शिव ने रामकथा सुनाते हुए कहा कि धरती पर जब रावण का अत्याचार बढ़ गया तो पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की। ऋषि-मुनियों ने भी ब्रह्मा जी की आरती की। सभी ने अपनी-अपनी जगह पर खड़े होकर भगवान विष्णु की आराधना की। भगवान विष्णु ने सभी को प्रतीक्षा करने का कहा। कथा के अगले चरण में अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र की कामना लिए गुरु वशिष्ठ से भविष्य की बात बताने की याचना की। इस पर वशिष्ठ ने पुत्रेष्टि यज्ञ का सुझाव दिया। शृंगी ऋषि ने यज्ञ को पूर्ण कराया। यज्ञ देवता प्रकट हुए और गुरु वशिष्ठ को खीर प्रदान की। खीर का आधा हिस्सा रानी कौशिल्या ने ग्रहण किया। शेष का एक चौथाई हिस्सा रानी कैकेई को दिया गया। शेष एक चौथाई हिस्से को दो भाग में बांटकर कौशिल्या व कैकेयी ने सुमित्रा को दिया। नियम समय पर अयोध्या में भगवान राम प्रकट हुए। उस वक्त धरती पर खुशहाली छा गई। देवताओं ने आकाश मार्ग से पुष्पवर्षा की।

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