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गोरखपुर के इस मंदिर में आज भी बलि परंपरा को जीवित रखने के लिए क्षत्रिय देते है अपना रक्त

गोरखपुर के इस मंदिर में आज भी बलि परंपरा को जीवित रखने के लिए क्षत्रिय देते है अपना रक्त
12 दिन के बालक से लेकर बुजुर्ग तक चढ़ाते है इस मंदिर में अपना रक्त
आस्था और विश्वास का केंद्र है बांसगांव का दुर्गा मंदिर
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
बाँसगाँव। नीतीश सिंह । बाँसगाँव संदेश। बांसगांव स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में शारदीय नवरात्र पर्व के नवमी तिथि को बांसगांव के श्रीनेत वंशीय क्षत्रियों ने मां दुर्गा के चरणों में स्वरक्त अर्पित कर मां की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद मांगा। इस धार्मिक आयोजन में शरीक कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने बताया कि गुरुवार नवमी के दिन मंदिर परिसर में पंक्ति बद्ध ढंग से खड़े दर्जनभर नाईयों के हाथ में खुले उस्तरों के सामने भयमुक्त भाव से आस्था के सहारे खड़े होकर श्रीनेत वंशीय क्षत्रिय जिसमे अबोध बालक एक जगह ललाट एवं यज्ञोपवीत संस्कार के बाद के क्षत्रिय वंशीयों को 9 जगह चीरा लगाया जाता है।नवजात शिशुओं (निष्क्रमण के बाद) और यज्ञोपवीत न धारण करने वाले लोगों द्वारा ललाट से रक्त निकलने के लिए चीरा  लगने के बाद वहां से निकले रक्त को बेलपत्र पर उतारकर कुल देवी माँ दुर्गा  के चरणों में अर्पित करने की लगी होड़ का दृश्य अद्भुत और बेमिसाल लगता है। जो लोग अन्यत्र जगहों पर रोजी रोटी के लिए रहते है वह भी लोग नवमी तिथि को हर हाल में माँ के दर्शन के लिए आते है। ऐसी आस्था बहुत ही कम देखने को मिलती है। बताते चलें कि इस जहाँ चीरा लगा होता है उस घाव पर महाअष्टमी की रात में हुए हवन की भभूत को लगाया जाता है।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
इस अवसर पर श्रीनेत वंशीय क्षत्रिय धार्मिक अनुष्ठान में पहुंच करके मां के चरणों में स्वरक्त अर्पित कर मां से सभी की सुख शांति व समृद्धि की कामना की। इस मौके पर न्यायमूर्ति रामकृष्ण गौतम, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष विवेकानंद सिंह,  एसडीएम बस्ती  नित्यानंद श्रीनेत ,एडीजे बाराबंकी चंद्र विजय श्रीनेत,  सुनील सिंह सुशील सिंह, बाल कल्याण समिति के सदस्य सुनील सिंह, जिला सहकारी बैंक के पूर्व डायरेक्टर अवधेश सिंह, सपा के पूर्व प्रदेश कार्यकारणी सदस्य निर्मल सिंह, प्रगतिशील किसान रमेश बहादुर सिंह,सांसद कमलेश पासवान,कांग्रेश की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत,पूर्व जिला पंचायत सदस्य जितेंद्र सिंह,समाजसेवी अमरजीत सिंह, पूर्व जिला पंचायत सदस्य मनोज सिंह,गुड्डू शाही, कृष्ण बिहारी सिंह,ग्लोरियस के प्रबंधक अजय सिंह,पूर्व नगर अध्यक्ष अंशुमान सिंह,नगर अध्यक्ष वेद प्रकाश शाही, पूर्व ब्लाक प्रमुख चतुर्भुज सिंह, डॉ उमेश सिंह डॉ शिवेंद्र सिंह राजेश सिंह उर्फ पोलू, इंजीनियर अमरेश सिंह,डॉ अशोक सिंह आदि लोग ने माता दुर्गा का दर्शन किया।
क्या है इस प्राचीन मंदिर का इतिहास
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
बांसगांव। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में नवरात्र पर एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें माताएं खुद नवजात का रक्त मां दुर्गा को चढ़ाती हैं। गोरखपुर जिले के बांसगांव इलाके के लोगों की मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र में नवजात के रक्त से ही प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा बनाए रखती हैं। यहां पर हर साल नवरात्रि मे नवमी तिथि को पूरे इलाके के हजारों क्षत्रिय वंशज दुर्गा मंदिर में अपने शरीर का रक्त मां को चढ़ाते हैं।बारह दिन के बच्चे से लेकर सौ साल तक के बुजुर्गों के शरीर के आठ जगहों से रक्त निकालकर मां दुर्गा को चढ़ाया जाता है। रक्त निकालने के लिए शरीर के नौ जगहों को थोड़ा सा चीरा लगाया जाता है। बड़े लोग यह दर्द सह लेते हैं लेकिन मासूम बच्चे रोने लगते हैं। इतना ही नहीं आस्था ऐसी है कि उनके घाव पर किसी दवा की जगह भभूत लगा दिया जाता है।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
आस्था और विश्वास का केंद्र है बांसगांव का दुर्गा मंदिर
इस मंदिर में दुतिया तिथि से होती है मां दुर्गा की पूजा
गोरखपुर जिले से 40 किमी दूर बांसगांव क्षेत्र में यह दुर्गा मंदिर स्थित है।इस मदिर में यूं तो हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है, पर शारदीय नवरात्र की परंपरा अलग है। यहा नवरात्रि में द्वितीय तिथि  से पूजा अर्चना शुरू किया जाता है । प्रथम तिथि मान होने के चलते श्रीनेतवंशीय क्षत्रिय मंदिर में कोई पूजा अर्चना नही करते । दुतिया से मंदिर में कलश स्थापना के बाद ही लोग घरों में कलश स्थापना शुरू कर पूजा अर्चना शुरू करते है।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
अष्टमी की रात क्षत्राणियां के लिए विशेष महत्व रखती है
इतना ही अष्टमी में श्रीनेतवंशी क्षत्राणियां रात में मां की पूजा करती हैं। मंदिर में भव्य मेले का आयोजन भी उसी दिन होता है एवं नव वधुओ को भी पहली बार मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति होती है। अगर नव वधुएं इस दिन मंदिर में माता का दर्शन किसी कारण नही कर पाती है तो उनको साल भर इसी दिन का इंतजार करना होता है। उसके बाद नवमी को बली प्रथा शुरू होती है।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
क्षत्रिय समाज द्वारा बलि प्रथा को जीवित रखने का काम किया है
कई सालों पहले यहां जानवरों की बलि दी जाती थी।ऐसे में जानवरों की बलि को रोकने के लिए उस वक्त एक संत ने क्षत्रिय समाज से अपील की थी साथ ही जानवर की बलि देने के बदले खुद के शरीर से निकले खून से मां का अभिषेक करने का सुझाव दिया था, जिसके बाद से इस अनोखी परंपरा की नींव पड़ी थी।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत
क्या है इस कार्यक्रम की विधि
एक ही उस्तरे से सभी श्रद्धालुओं के शरीर को काटा जाता है और निकले रक्त को बेलपत्र के ऊपर लगाकर इस मंदिर में चढ़ाया जाता है।दवा की जगह हवन कुंड का भभूत लगाया जाता है।यहां के लोग मानते हैं कि रक्त चढ़ाने से मां खुश होती हैं और उनका परिवार निरोगी और खुशहाल रहता है।मंदिर के पुजारी श्रवण कुमार पाण्डेय का कहना है कि सैकड़ों सालों से इस परंपरा का निर्वहन श्रीनेत वंश के क्षत्रिय करते आ रहे हैं।
बांसगांव दुर्गा मंदिर में रक्त देते राजपूत

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